Susral susral hi kyu ban jata hai apna ghar banane ki koshish kro pher bhi nahi banta

Susral susral hi kyu ban jata hai apna ghar banane ki koshish kro pher bhi nahi banta

रिश्ता अपनों का

“राजीव प्लीज़ जल्दी आ जाओ। मम्मी का कॉल आया था, वो… वो कह रही थी कि पापा को एडमिट करवाया है। तबीयत बहुत खराब है उनकी । हमें अभी ही अस्पताल जाना चाहिये। प्लीज़ छुट्टी ले कर आ जाओ। ”

“चिल सुमि, अस्पताल में डॉक्टर हैं ना वो देख लेंगे और यार अभी तो किसी हालत में छुट्टी नहीं देगा बॉस। याद है ना चार दिन पहले ही दीदी की बेटी के मुंडन के लिए छुट्टी ली थी। सुनो ना शाम में चलेंगे ना, वैसे भी आधा घंटा ही तो लगेगा। ”

अलग समझा मेरे मम्मी पापा को

“पर राजीव.. पापा.. मम्मी वहाँ अकेली.. कैसे वो सब कुछ देखेगी। किस हालात से गुजर रही होगी । ”

“तुम भी बहुत जिद्दी हो यार। एक काम करो, कैब बुक कर लो और चली जाओ। मैं शाम में वहीं आ जाऊँगा और हाँ जाने से पहले माँ पापा का लंच बना कर रख देना, नहीं तो फिर से घर में नाटक होने लगेगा। ”

राजीव की बातों से कहीं भी नहीं लगा कि उन्हे मेरे माँ पापा की ज़रा भी चिंता है । ऐसी हालत में कौन ऐसे मुँह मोड़ता है भला। मैं तो ससुराल में सबका ध्यान रखती , सास ससुर सबकी जिम्मेदारी मुझ पर थी और मैं अपनी जिम्मेदारी पूरी भी करती साथ ही यह भी उम्मीद करती कि राजीव भी मेरे मायके के लिए अपनी जिम्मेदारी का पूर्ण निर्वहन करें पर जैसे जैसे मैं जिम्मेदार बनती गयी वैसे वैसे राजीव गैर जिम्मेदार होने लगे।

मैंने सोच लिया कि मैं तो जाऊँगी ही । मैंने कैब बुक किया और जल्दी जल्दी लंच बनाकर चली गयी । वो डेढ़ घण्टे मुझ पर कैसे बीते ये मेरे सिवाय शायद ही कोई समझ पाये। हर पल पापा का चेहरा दिखता सामने जैसे वो हँस कर मुझे अपने पास बुला रहे हों और साथ ही माँ का रोता चेहरा दिखता जो एक अन्जाने डर का एहसास करा रहा था। घबराते घबराते हिलते कँपकँपाते हाथों से सारे काम निबटा कर मैं माँ के पास जाने निकल गयी। वहाँ जा कर देखा तो पापा खतरे से बाहर थे। बुखार बहुत ज्यादा होने की वजह से उन्हे एडमिट करना पड़ा था । माँ की सूजी आँखे उनकी हालत बयां करने के लिए काफी थी। मुझे देखते ही माँ लिपट गयी मुझसे और बोली – सुमि पापा ठीक हैं अभी । डॉक्टर ने कहा आज यहीं रखेंगे अपनी देख रेख में और कल हम पापा को घर ले जा सकेंगे।

माँ सब ठीक हो जायेगा, आप टेंशन ना लो। सुबह से आप यहीं बैठी हो, जाओ आप नहा कर कुछ खा लो तब तक मैं हूँ यहाँ पापा के पास। बहुत मुश्किल से मैने माँ को सम्भाला और जबरदस्ती घर भेजा। सोचा राजीव को बता दूँ कि आज मैं यहीं रूकने का सोच रही हूँ । उनको यहीं बुला लूँगी और सास ससुर का खाना यहीं बना कर भिजवा दूँगी।

हैलो राजीव, हाँ पापा ठीक हैं अभी पर आज यहीं रहना पड़ेगा उन्हे अस्पताल में, तो सोच रही हूँ कि मैं यहीं रूक जाऊँ और आप भी शाम में यही आ जाना तो आपके साथ मैं…. !!

क्या मेरे साथ सुमि… तुमने बिना पूछे ही फैसला कर लिया तो रहो वहीं फिर बताने की क्या जरूरत है। तुम्हे तो परवाह है नही मेरे माँ बाप की, चाहे वो खाएं या ना खाएं| तुम बस अपने माँ बाप का खयाल रखो बस। तुम हो ना वहाँ तो मेरी क्या जरूरत है। तुम अपने माँ बाप का ध्यान रखो और मैं घर जा कर अपने माँ बाप का ध्यान रखूँगा। रखो फोन और जैसे खुद ही अकेली गयी हो वैसे ही खुद ही वापस भी आ जाना। समझी तुम।

हैलो राजीव, पर सुनो तो…!!!

कॉल कट चुका था । मेरी तो समझ में नही आ रहा था कि ये सब था क्या आखिर! राजीव ने एक बार भी पापा को नहीं देखना चाहा। सिर्फ मेरे माँ बाप तुम्हारे माँ बाप करते रह गये। खाना देने वाली थी ना मैं, जिम्मेदारी का एहसास है मुझे, पर राजीव ने तो मेरे ससुराल वालों के लिए मेरा प्यार, मेरा तप झूठा साबित कर मुझे गैर जिम्मेदार ठहरा दिया।

ठीक है अब जो है सो है। मैं माँ के साथ ही रही उस दिन। अगले दिन पापा के डिस्चार्ज होने के बाद भी मैं वापिस ससुराल नहीं गयी।

  • बेटे की पत्नी कभी बेटी नहीं बन सकती

शाम में सास का कॉल आया कि पिता सेवा हो गयी हो तो पति सेवा पर भी ध्यान दो । रोज रोज मैं खाना नहीं बना सकती यहाँ, ये तुम्हारा काम है मेरा नहीं| राजीव को भेज रही हूँ आ जाना साथ।

मन में तो आया कि कह दूँ “मुझे नहीं आना वापस, एक दिन खाना बनाने में ये हालत हो गयी कि इतना सुना दिया” पर संस्कारों की बेड़ियाँ पड़ी थी ना पैर में मेरे। कैसे कुछ कह देती। मैं तो राजीव के परिवार को अपना समझ सब से प्यार जो करने लगी थी, कैसे दे देती मैं उल्टा जवाब।

एक घंटे बाद राजीव आये। अंदर तक नहीं आये और ना ही पापा को देखना चाहा । अर्जेंट काम है ऐसा बहाना बना कर मुझे कार में बिठा बाहर से ही रवाना हो लिये।

इस आधे घंटे के सफर के दौरान मेरी राजीव से कोई बात नहीं हुई पर अपने आप से बहुत सी बातें की मैने।

“लड़की वाले इतना बाध्य क्यों हो जाते हैं कि जरूरत पड़ने पर दामाद को हक से कॉल कर के बुला भी नहीं सकते जैसा कि ससुराल वाले बहू पर हक जमाते रहते हैं। बहू रात दिन सास ससुर की सेवा करे तो सब खुश रहते हैं पर अगर वही बहू दो दिन बेटी का फर्ज निभा माँ बाप के लिए कुछ कर दे तो उलाहना देना शुरू हो जाता है। बहू पर घर परिवार सबकी जिम्मेदारी डाल कर उसे दबाए रखो पर जब बात दामाद की आती है तो सिर्फ आवभगत के सपने ही क्यों! जिस तरह लड़की खुद को भूल कर ससुराल में समर्पित हो जाती है, उसी तरह लड़का अपने ससुराल के दायित्वों का निर्वहन क्यों नहीं करता । लड़की को कहा जाता है कि शादी के बाद पति के माता पिता तुम्हारे माता पिता हुए तो यही बात लड़के से क्यों नहीं कही जाती कि लड़की के माता पिता तुम्हारी जिम्मेदारी है अब ।
किसी की बेटी किसी के घर की एक तरह से काम वाली बन जाती है

ऐसे ही कई खयालात लिए मैं घर पहुँच गयी । जहाँ किचन मेरी राह देख रहा था। डिनर का समय हो रहा था और सब टीवी के सामने मनोरंजन के मजे ले रहे थे। रास्ते भर मुझसे बात ना करने वाले राजीव के मुँह में भी जुबान आ गयी कि “लो माँ ले आया तुम्हारी बहू को, अब आराम करो तुम।” मेरे पैर खुद ही किचन की तरफ बढ़ने लगे तभी अचानक से मैंने अपने कदमों का रूख बदल दिया और सीधे बेडरूम में जा कर बैठ गयी ।

कुछ देर तक कोई हरकत ना हुई तो राजीव किचन में गये वहाँ मुझे ना पा कर रूम में आये और तेज आवाज में कहा- “तुम्हे यहाँ आराम करने लाया हूँ क्या? जाओ जो काम है वो करो । यहाँ आराम ना फरमाओ” ।

अपने संस्कारों को अपने घर ही छोड़ आई थी मैं और निडर हो कर कहा – “कल रात से जगी हूँ, मेरी तबीयत नहीं ठीक लग रही। मुझसे खाना नहीं बनेगा ।”

राजीव ने चिल्लाते हुए कहा – तुम नहीं तो कौन बनायेगा??

क्यों बहुत से किसी की बेटी को अपनी बेटी सा नहीं समझ सकते
वही जिन्होंने कल बनाया था । सक्षम हैं वो । कल बना सकती थी जो आज भी बना सकती हैं। जाकर उनसे कह दो आप कि बना ले खाना और हाँ मैं सिर्फ दो रोटी ही लूँगी। – कह कर मैं चुप चाप आँखे बंद कर के लेट गयी। मुझे नहीं पता था आगे क्या होगा पर मैं तैयार थी पूरी तरह से।

राजीव चुप चाप कमरे के बाहर चले गये । थोड़ी देर बाद किचन से आवाज़ें आने लगी।

कुछ देर रूक गयी मैं किचन में गयी। गरमा गरम रोटियाँ निकल रही थी । मैने थाली लिया तो सास ने ताना दिया – लगा, देखती हूँ कैसे खाना लगाती है बिना सब्ज़ी के। नाटक करवाना है ना! देख अब नाटक होगा।” समझ गयी मैं सासू की चाल पर बिना कुछ कहे हल्की ही मुस्कराहट लिये मैंने दो रोटियाँ निकाली उस पर नमक और घी लगा कर रोल बना कर अपने कमरे में ले कर आ गयी। खा कर पानी पी कर लेट गयी ।

रात के सन्नाटे में घर में हो रहा शोर साफ साफ सुनायी दे रहा था|

ये क्या सूखी रोटी कौन खायेगा?

एक वक्त खाना बनाने में तुम्हे इतनी तकलीफ हो रही है!

हाँ नही बनता मुझसे खाना, उस महारानी को कोई कुछ क्यों नही बोलता? खा कर सो रही है। सबका ठेका ले रखा है क्या मैंने?

माँ कल बना सकती थी तो आज क्यों नहीं! कम से कम आलू ही भून देती उससे ही खा लेते ।

तुम ही खाओ ये सूखी रोटी।

धड़ाम!! (थाली पटकने की आवाज)

एक घबराहट हुई, मन में तो दिल की धड़कनों को सम्भालता हुआ दिमाग बोला – सो जाओ सुमि, सब मतलब परस्त हैं यहाँ। इनके साथ रहना है तो तुम भी मतलब परस्त ही बन जाओ

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